हिन्दी काव्य कविता
द बेस्ट
Wednesday, February 6th, 2008
पर्वत की चोटी पर झूमता हुआ विशाल वृक्ष नही बन सकते
तो घाटी में खड़ा छोटा पौधा ही बन जाओ ,परन्तु बनो .
पर्वत की विशाल सतह से चिपकी छोटी सुंदर बेल ,
पौधा नही बन सकते तो बेल ही बन जाओ ,परन्तु बनो .
तना नही बन सकते हो तो शाखा ही बन जाओ
किंतु ऐसी जो […]
डर गयी संध्या गुम सुम सबेरे हो गए
Sunday, December 23rd, 2007
हम प्रगति के दौर में इतने अकेले हो गए.
डर गयी संध्या गुम सुम सबेरे हो गए.
जंगलों को साफ कर,कुछ बस्तियां बस्ती गयीं,
बस्तियों के लोग कैसे जंगली से हो गए.
आज का वातावरण बदला हुआ कितना यहाँ,
हर तरफ ही संतुलन पर्यावरण के खो गए.
वायु जल ध्वनि इस तरह क्यों कर डियर इतने प्रदूषित,
प्रश्न सब के सामने क्यों […]
आरती के दीप नूतन फिर सजाना चाहते है..
Sunday, December 23rd, 2007
माँ तुम्हारी वंदना में गुनगुनाना चाहते है.
आरती के दीप नूतन फिर सजाना चाहते है.
छल छ्लाती जान्हवी अमृत परसने फिर लगे.
मोक्ष की अवधारणा का सच बताना चाहते है.
जल नही अमृत समझकर पान नित करते रहें,
फिर वही पावन धरोहर हम बनाना चाहते है.
रज कणों की कल्पना भी कल्प-तरु से की गयी.
हम मनोरथ पूर्ण का आश्रय जताना चाहते […]
मिलोगी तुम कभी?
Tuesday, December 18th, 2007
सरिताओं का गहरा सागर उमड़ा था ,
जब देखा था तुमने !
चाहत भरी आंखो से मुझे .
चाहता था डूब जाऊं उनमे ,
पर नही पा सका
तुम्हारा वह अस्तित्व ,
फिर भी प्रतीक्षारत हूँ,आज तक इसलिए !!
मिलोगी तुम कभी तो,
ख्वाब में या ख्यालों में
एक अ-अस्प्स्ट सी परछाईं बनकर.