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संदेशा-दुखती हुई आंखों का

By admin | March 15, 2008




गुल -ऐ -उम्मीद  की  टहनी  की  पेशानी  से ,
किस्मत  के  सितारे  की  तरह  टूटते
ऐ आखरी  पत्ते ….
मुझे  तुम  को  तुम्हारी  मौत  का  परसा
भरी  आंखों से  देना  है
मगर , इक  दर्द  मेरा  भी ….
अगर  तुम  सुन  सको  तो….?
एक  लम्हे  को  सुनो …
तुम्हारा  भी  सफर  उस  सिम्त  है  अब  से
जहां  से  वापसी  मुमकिन  नही  होती
जहां जश्न -ऐ -चिरागाँ
जश्न-ऐ-खुशबू  हो …
खिजां मोसम  के  नोहे  हों
या मातम  हो
शुकून में  फर्क  बिल्कुल  भी  नही  आता …
सुनो ………..?
इस  नींद  नगरी  में
मेरे  प्यारे  भी  सोते  हैं
उन्हें  कहना …
मैं थकन  से  चूर  हूँ  बिल्कुल
मुझे खामोशियाँ  अब रास आती  हैं
मेरी  आंखों  की  झीलें  खुश्क  हैं  कब  से
फ़क़त  अब  हसरतों  की  कंकरें ……….
पलकों  में  चुभती  हैं …….
मेरी  साँसे  ,मेरे  दिल  से  उलझती  हैं
मुझे अब जागना  ,बे -खवाब  रहना
दर्द  देता  है……
मैं  हर चेहरे  को तकती  हूँ
किसी की  आँख  में
अब  अक्स  …..मेरा  रुक  नही  पाता
भरे  आकाश  पर  मेरे  लिए
कोई  सितारा  अब  नही  रोशन
नज़र थक  कर ज़मीन  की ओर तकती है
उन्हें  कहना  के …
में  उन  के  बिना  अब  बुहत  तनहा  हूँ
अगर  जो  हो  सके  तो
इस  शहर -ऐ -पनाह  की  सर -ज़मीन , की  मेहरबान
बाहों  में  थोडी  सी  पनाह  मेरे  लिए
उन  से  जो  बन  पाये ….
तो  मैं भी  नींद  नगरी  में  चली  आऊँ
मेरी दुखती  हुयी  आंखों  को
बे-ख्वाबी   के  जिंदगी  से  रिहाई  हो
मैं गहरी  नींद सो जाऊं ……..

द्वारा- पूनम भरद्वाज, सी.सी.एस. यूनिवर्सिटी मेरठ

Topics: ग़ज़ल और शेरो-शायरी |

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